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रंगभूमि

रंगभूमि

मुंशी प्रेमचंद

19h 35m
234,944 words
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रंगभूमि प्रेमचंद का एक महत्वपूर्ण उपन्यास है जो 1925 में प्रकाशित हुआ था। इस उपन्यास का मुख्य पात्र सूरदास है, जो एक अंधा भिखारी है लेकिन अत्यंत स्वाभिमानी और सिद्धांतवादी व्यक्ति है। कहानी काशी के आसपास के क्षेत्र में घटित होती है, जहाँ एक अंग्रेज व्यापारी जॉन सेवक एक सिगरेट का कारखाना स्थापित करना चाहता है। सूरदास अपनी झोंपड़ी और उस पवित्र स्थान को छोड़ने से इनकार कर देता है जहाँ वह भगवान की भक्ति में लीन रहता है। इस संघर्ष के इर्द-गिर्द पूरा कथानक बुना गया है।

उपन्यास में प्रेमचंद ने कई महत्वपूर्ण सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों को उठाया है। औद्योगीकरण के कारण पारंपरिक जीवनशैली पर पड़ने वाले प्रभाव, धर्म और आध्यात्म के नाम पर होने वाले शोषण, जाति-प्रथा की समस्याएँ, और ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीयों की दुर्दशा जैसे विषयों का गहरा चित्रण है। सूरदास के चरित्र के माध्यम से प्रेमचंद ने दिखाया है कि शारीरिक अपंगता के बावजूद भी व्यक्ति कैसे नैतिक दृढ़ता और आत्मसम्मान के साथ अन्याय का प्रतिरोध कर सकता है।

रंगभूमि हिंदी साहित्य में अपना विशिष्ट स्थान रखता है क्योंकि यह प्रेमचंद के कलात्मक परिपक्वता का प्रतीक है। यह उपन्यास न केवल व्यक्तिगत संघर्ष की कहानी है, बल्कि समूचे भारतीय समाज के संक्रमण काल का दस्तावेज भी है। प्रेमचंद ने इसमें यथार्थवादी शैली का प्रयोग करते हुए समाज के विभिन्न वर्गों का प्रामाणिक चित्रण किया है। आज भी यह उपन्यास उन लोगों के लिए प्रासंगिक है जो विकास के नाम पर होने वाले विस्थापन और सामाजिक न्याय के मुद्दों को समझना चाहते हैं।

उपन्याससामाजिक यथार्थवादहिंदी साहित्यआदर्शोन्मुख यथार्थवाद20वीं सदीब्रिटिश कालसामाजिक सुधारजातिवादधर्म और समाजगरीबीशोषणमानवीय संघर्षभारतीय समाजनैतिक मूल्यआर्थिक असमानतासामाजिक न्यायराष्ट्रीयताप्रेमचंद
PublisherKafka
LanguageHindi
Source
Wikisource

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