
पूस की रात
पूस की जमा देने वाली ठंड आ गई है और किसान हल्कू के पास केवल तीन रुपये हैं। ये पैसे उसने खेत में रात काटने के लिए एक कम्बल खरीदने के वास्ते जोड़े थे। लेकिन दरवाजे पर कर्ज वसूलने वाला सहना खड़ा है। गालियों से बचने के लिए हल्कू अपनी पत्नी मुन्नी के कड़े विरोध के बावजूद वे रुपये सहना को सौंप देता है और बिना कम्बल के ही अपने कुत्ते जबरा के साथ ठिठुरती रात में खेत की रखवाली करने निकल पड़ता है।
खुले आसमान के नीचे यह कहानी उसी एक रात का विवरण है। बर्फीली हवाओं के बीच हल्कू के पास गर्माहट के लिए केवल एक जानवर का साथ है, जबकि उसकी फसल और शरीर दोनों दांव पर लगे हैं।
बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में प्रकाशित यह रचना प्रेमचंद के यथार्थवाद का एक प्रमुख हिस्सा है। यह उस दौर के ग्रामीण भारत और उस कृषि व्यवस्था का सीधा दस्तावेज़ है, जिसमें किसान की उपज हमेशा कर्ज के बोझ तले दब जाती है।












































