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पंच परमेश्वर

पंच परमेश्वर

मुंशी प्रेमचंद

21 min
4,059 words
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पंचपरमेश्वर मुंशी प्रेमचंद की एक महत्वपूर्ण और विचारोत्तेजक कहानी है जो ग्रामीण न्याय व्यवस्था और मानवीय मूल्यों के द्वंद्व को प्रस्तुत करती है। कहानी में जुम्मन शेख और अलगू चौधरी दो घनिष्ठ मित्र हैं। जुम्मन अपनी बूढ़ी खाला के साथ एक समझौता करते हैं कि वे उन्हें आजीवन भरण-पोषण देंगे यदि वह अपनी संपत्ति उन्हें सौंप दें। लेकिन समय के साथ जुम्मन और उनकी पत्नी खाला के साथ दुर्व्यवहार करने लगते हैं। खाला पंचायत में न्याय मांगती हैं और अलगू को पंच चुना जाता है। मित्रता के दबाव के बावजूद अलगू निष्पक्ष फैसला देते हैं और जुम्मन के खिलाफ निर्णय सुनाते हैं।

इस घटना से दोनों मित्रों में दुश्मनी हो जाती है। बाद में अलगू और समझू साहू के बीच एक बैल की बिक्री को लेकर विवाद होता है और इस बार जुम्मन को सरपंच चुना जाता है। अलगू को डर है कि जुम्मन बदला लेंगे, लेकिन पंच की कुर्सी पर बैठने के बाद जुम्मन भी अपनी निजी भावनाओं से ऊपर उठकर न्यायपूर्ण फैसला देते हैं और अलगू के पक्ष में निर्णय सुनाते हैं। यह फैसला सुनकर दोनों मित्रों में फिर से मेल-मिलाप हो जाता है।

यह कहानी न्याय, ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के महत्वपूर्ण विषयों को उजागर करती है। प्रेमचंद ने यह दर्शाया है कि पंच की कुर्सी व्यक्ति को निजी स्वार्थ और पूर्वाग्रहों से ऊपर उठा देती है। कहानी का शीर्षक ही इस बात को रेखांकित करता है कि पंच का स्थान परमेश्वर के समान होता है। प्रेमचंद ने ग्रामीण समाज की पंचायती व्यवस्था को सकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया है और यह संदेश दिया है कि सच्चा न्याय व्यक्तिगत संबंधों से परे होता है। यह कहानी हिंदी साहित्य में आज भी प्रासंगिक मानी जाती है क्योंकि यह मानवीय चरित्र की उच्चता और नैतिक मूल्यों की विजय को दर्शाती है।

कहानीहिंदी साहित्यप्रेमचंदग्रामीण जीवनन्यायनैतिकतापंचायतसामाजिक यथार्थवादमानवीय मूल्यभारतीय समाज20वीं सदीआदर्शोन्मुख यथार्थवादग्रामीण समस्याएंमित्रताकर्तव्य
PublisherKafka
LanguageHindi
Source
munshi-premchand-all-stories

Books by मुंशी प्रेमचंद

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