
“दुखवा मैं कासे कहूँ मोरी सजनी” आचार्य चतुरसेन शास्त्री की एक छोटी, मगर अत्यंत मार्मिक कहानी है। कश्मीर के दौलतख़ाने में बादशाह अपनी नई दुलहिन सलीमा को लेकर रहने आए हैं। एक रात, बादशाह की अनुपस्थिति में, सलीमा अपनी उदास और कमसिन बाँदी साक़ी से उसके दुख का कारण पूछती है। साक़ी के एकांत, उसके विषाद और एक टूटी हुई धुन के पीछे जो रहस्य छिपा है, वह धीरे-धीरे खुलता है — और कहानी पहचान, स्त्रीत्व, सम्मान और प्रेम के द्वंद्व के बीच एक त्रासद ऊँचाई तक पहुँचती है। मूल पाठ हिन्दवी (रेख़्ता फ़ाउंडेशन) से लिया गया है।