
जीवित और मृत
रानीघाट में जमींदार शारदाशंकर के घर में रहने वाली विधवा कादम्बिनी के जीवन में केवल एक ही रिश्ता बचा है—अपने देवर का बेटा, जिसे उसने जन्म के बाद से पाला है। सावन की एक रात अचानक कादम्बिनी की साँसें रुक जाती हैं। पुलिस से मामले को दूर रखने के लिए जमींदार के चार ब्राह्मण कर्मचारी रात के अँधेरे में ही उसके शरीर को बस्ती से दूर एक निर्जन श्मशान ले जाते हैं।
श्मशान से जब यह मृत घोषित स्त्री लौटकर आती है, तो एक नया संकट खड़ा होता है। जमींदार का परिवार और समाज उसे वापस अपनाने से इंकार कर देते हैं। उसे अपने ही लोगों के बीच यह साबित करना पड़ता है कि वह अभी जीवित है। इस संग्रह में शीर्षक कहानी के साथ-साथ उन्नीसवीं सदी के बंगाल, वहाँ के सामाजिक नियमों और स्त्रियों के जीवन की अन्य कहानियाँ शामिल हैं।
नोबेल पुरस्कार विजेता रवीन्द्रनाथ ठाकुर का यह कथा संग्रह बंगाल पुनर्जागरण और भारतीय साहित्य का एक प्रमुख हिस्सा है। हिंदी अनुवाद में प्रस्तुत।

































