
अमावस्या की आधी रात को, मृत्युंजय आम के बाग़ में स्थित एक एकांत मंदिर में देवी जयकाली की तांत्रिक पूजा समाप्त करता है। मूर्ति के आसन के नीचे छिपे कटहल के काठ के बक्स को जब वह अपने जनेऊ से बँधी चाबी से खोलता है, तो भीतर कुछ नहीं मिलता। बक्स का ताला टूटा नहीं था, फिर भी खजाना गायब है। सुबह होने पर चंडीमंडप में बैठे हताश मृत्युंजय के सामने एक जटाधारी संन्यासी प्रकट होता है, जो बिना बताए ही उसके इस शोक का कारण जानता है।
खोए हुए खजाने की इस घटना के साथ, यह कथा संग्रह उन्नीसवीं सदी के बंगाल की अन्य कहानियों को प्रस्तुत करता है। इनमें स्त्रियों की सामाजिक स्थिति, संपत्ति और विवाह के विवाद, तथा पुरानी मान्यताओं और नए सामाजिक सुधारों के बीच का सीधा टकराव दर्ज़ है।
नोबेल पुरस्कार विजेता रवीन्द्रनाथ ठाकुर की ये कहानियाँ बंगाल पुनर्जागरण के दौर की गवाह हैं। मूल बंगाली क्लासिक का हिंदी अनुवाद।