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देवी

देवी

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

19 min
3,664 words
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"देवी" सूर्यकांत त्रिपाठी निराला द्वारा रचित एक महत्वपूर्ण कहानी है जो भारतीय समाज में नारी की स्थिति और उसके संघर्ष को गहराई से चित्रित करती है। यह कृति एक ग्रामीण महिला की कहानी प्रस्तुत करती है जो अपने जीवन में अनेक कठिनाइयों और सामाजिक बंधनों का सामना करती है। निराला ने इस रचना में भारतीय नारी के त्याग, समर्पण और आंतरिक शक्ति को उजागर किया है, साथ ही समाज में व्याप्त पितृसत्तात्मक मूल्यों और रूढ़िवादिता पर तीखा प्रहार किया है।

इस कृति की मुख्य विशेषता यह है कि निराला ने साधारण ग्रामीण स्त्री को देवी के रूप में प्रतिष्ठित किया है, लेकिन केवल उसकी पूजा तक सीमित रखने की सामाजिक प्रवृत्ति पर प्रश्न उठाया है। कहानी में नारी के वास्तविक जीवन संघर्ष, उसकी पीड़ा और सामाजिक अन्याय को संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत किया गया है। निराला की यथार्थवादी शैली और मानवीय संवेदना इस रचना को विशिष्ट बनाती है।

साहित्यिक दृष्टि से "देवी" हिंदी साहित्य में प्रगतिशील और स्त्री-केंद्रित लेखन की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। छायावादोत्तर युग में लिखी गई यह रचना सामाजिक यथार्थवाद का उत्कृष्ट उदाहरण है। निराला ने इस कृति के माध्यम से न केवल नारी मुक्ति का स्वर उठाया बल्कि समाज के उस दोहरे चरित्र को भी उजागर किया जो स्त्री को देवी कहकर पूजता है लेकिन उसके मानवीय अधिकारों को नकारता है। यह रचना आज भी प्रासंगिक है और नारी सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण साहित्यिक योगदान मानी जाती है।

हिंदी साहित्यकविताछायावादआधुनिक हिंदी काव्यस्त्री विमर्शनारी शक्तिदेवी रूपक20वीं सदीभारतीय साहित्यप्रगतिवादरोमांटिक काव्यसामाजिक चेतना
PublisherKafka
LanguageHindi
Source
cturii-cmaar-suurykaant-tripaatthii-niraalaa

Books by सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

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