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निराला के निबंध

निराला के निबंध

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

2h 54m
34,759 words
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'निराला के निबंध' निराला जी के बहुआयामी व्यक्तित्व का परिचायक है, जिसमें वे एक कवि के स्थान पर एक गंभीर चिंतक और निर्भीक समीक्षक के रूप में उपस्थित होते हैं। इस संकलन में संकलित २२ अध्याय निराला की वैचारिक यात्रा के विभिन्न पड़ावों को दर्शाते हैं। 'भाषा की गति और हिन्दी की शैली' जैसे निबंधों में जहाँ वे हिंदी के भाषाई स्वरूप पर गहन चर्चा करते हैं, वहीं 'कामायनी महाकाव्य परीक्षा' और 'महाकवि रवीन्द्र की कविता' जैसे लेखों में उनकी आलोचनात्मक प्रतिभा का उत्कर्ष देखने को मिलता है। निराला ने इन निबंधों के माध्यम से न केवल परंपरा का सम्मान किया है, बल्कि रूढ़ियों पर कड़ा प्रहार भी किया है।

इस संग्रह की महत्ता इस बात में भी है कि इसमें निराला के व्यक्तिगत संस्मरण और समकालीन साहित्यकारों—जैसे महादेवी वर्मा, तुलसीदास और भारतेन्दु हरिश्चन्द्र—के प्रति उनके दृष्टिकोण का समावेश है। 'शक्ति परिचय' और 'प्राच्य और पाश्चात्य' जैसे निबंध उनके दार्शनिक चिंतन और सांस्कृतिक बोध को स्पष्ट करते हैं। निराला का गद्य अपनी दुरुहता के बावजूद एक आंतरिक लय और तर्क की स्पष्टता से युक्त है, जो पाठक को हिंदी गद्य की वास्तविक शक्ति से परिचित कराता है। यह संकलन शोधार्थियों, कवियों और गंभीर पाठकों के लिए एक अनिवार्य ग्रंथ है, जो छायावादी युग की वैचारिक पृष्ठभूमि को समझने में मदद करता है।

निबंधहिंदी साहित्यछायावादआधुनिक हिंदी साहित्य20वीं सदीमानवतावादकला और साहित्यसांस्कृतिक आलोचनाव्यक्तित्व विकासभारतीय दर्शनसमसामयिक विषयगद्य साहित्यप्रगतिशील विचारसाहित्यिक आलोचनाभाषा-विज्ञानहिंदी गद्यवैचारिक लेखनिराला साहित्यतुलनात्मक साहित्यसांस्कृतिक चिंतन
PublisherKafka
LanguageHindi
CopyrightThe source text and calculation are believed to be in the public domain.

Books by सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

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