
इन दो निबंधों में आचार्य चतुरसेन शास्त्री का व्यंग्य और सामाजिक क्रोध सीधे-सीधे उभरकर आता है। “क्रोध” एक धोखा खाए मित्र की पीड़ा, अमीरी की कठोरता और भूख की त्रासदी का तीखा एकालाप है। “धर्म और पाप” भारतीय मंदिरों, संप्रदायों, चंदा-दानदाताओं और राजपुरुषों की अर्थव्यवस्था को बेपर्द करता एक निर्भीक निबंध है, जो धर्म के नाम पर इकट्ठा होते धन और पाप के नाम पर पनपते अपराधों — दोनों के सदुपयोग की बात उठाता है। मूल पाठ क्रमशः हिन्दवी (रेख़्ता फ़ाउंडेशन) और हिंदीसमय (महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय) से लिए गए हैं।