
हड़ताल
Translated by मुंशी प्रेमचंद
1909 में लंदन के डयूक ऑफ़ यॉर्क रंगमंच पर पहली बार खेला गया गाल्सवर्दी का यह नाटक श्रम और पूँजी के संघर्ष का एक मार्मिक अध्ययन है। पाँच महीने से कारख़ाना बंद है, मज़दूर भूख से मर रहे हैं, उनकी पत्नियाँ बच्चों को पालने में असमर्थ हैं — फिर भी रॉबर्ट्स अपनी जिद पर अड़ा है। दूसरी ओर मालिक एंथनी, जो कंपनी के संस्थापक हैं, उतने ही दृढ़ हैं कि एक इंच भी झुकेंगे नहीं।
गाल्सवर्दी की सबसे बड़ी कलात्मक उपलब्धि यह है कि वे न मज़दूरों के साथ हैं, न मालिकों के — वे दिखाते हैं कि कैसे दो असाधारण इच्छाशक्तियों की भिड़ंत में दोनों पक्ष नष्ट हो जाते हैं और जो समझौता अंत में होता है, वह वही था जो शुरू में हो सकता था। नाटक का अंत पाठक को यह सोचने पर छोड़ जाता है — क्या नेतृत्व का गुण ही उसका दोष भी है?
प्रेमचंद ने 1930 के आसपास यह अनुवाद हिंदी पाठकों के लिए तैयार किया, जब भारत में स्वतंत्रता आंदोलन और मज़दूर आंदोलन दोनों चरम पर थे। अनुवाद की भाषा सरल, मंचनीय, और मूल की लय को बनाए रखनेवाली है।
यह नाटक उन पाठकों के लिए है जो यूरोपीय आधुनिक नाटक के क्लासिक नमूने को हिन्दी में पढ़ना चाहते हैं — और जो श्रम-संघर्ष की कथा को किसी आसान नैतिक उत्तर के बिना समझना चाहते हैं।

























