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उर्वशी

उर्वशी

रामधारी सिंह 'दिनकर'

2h 23m
28,534 words
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एक अप्सरा और एक नश्वर मनुष्य के बीच का प्रेम—स्वर्ग और पृथ्वी के बीच की दूरी जितना असंभव, फिर भी उतना ही शाश्वत। जब उर्वशी, इंद्र के दरबार की सबसे रूपवान अप्सरा, पुरुरवा नामक मानव राजा से प्रेम करने लगती है, तो दोनों लोकों के नियम टकरा जाते हैं। यह केवल एक प्रेम कथा नहीं है—यह इच्छा और कर्तव्य के बीच, देह और आत्मा के बीच, क्षणभंगुर सौंदर्य और अमरता की चाह के बीच का द्वंद्व है।

दिनकर ने इस प्राचीन पौराणिक आख्यान को आधुनिक मनोविज्ञान और दार्शनिक गहराई से भर दिया है। उनकी काव्य-भाषा तरल और तेजस्वी दोनों है—कहीं श्रृंगार की कोमलता तो कहीं अस्तित्वगत प्रश्नों की तीक्ष्णता। पात्र केवल पौराणिक प्रतीक नहीं रहते; वे मानवीय संघर्ष से भरे जीवंत व्यक्तित्व बन जाते हैं। काम और प्रेम के बीच का अंतर, मर्यादा और मुक्ति का टकराव, और सबसे बढ़कर—क्या प्रेम नियति से बड़ा हो सकता है?—ये प्रश्न रचना में गूंजते रहते हैं।

यह नाट्य-काव्य उन पाठकों को पुरस्कृत करता है जो पौराणिक कथाओं में समकालीन मानवीय सत्य खोजते हैं। जो हिंदी साहित्य में छायावादोत्तर युग की प्रगतिशील दृष्टि और शास्त्रीय रूप के संगम को समझना चाहते हैं, उनके लिए यह अनिवार्य है। दिनकर का उर्वशी केवल प्रेम की कहानी नहीं—मनुष्य की उस शाश्वत यात्रा का दस्तावेज़ है जो सीमाओं को लांघकर असीम को छूना चाहता है।

खंडकाव्यहिन्दी कवितानाटकपुरुरवाउर्वशीगीति-नाट्यआधुनिक हिन्दी साहित्यछायावादोत्तर काव्यपौराणिक आख्यानप्रेम काव्यक्लासिक हिन्दी साहित्य
PublisherKafka
LanguageHindi
Source
Hindi Kavita

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