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ध्रुवस्वामिनी

ध्रुवस्वामिनी

जयशंकर प्रसाद

1h 2m
12,394 words
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ध्रुवस्वामिनी जयशंकर प्रसाद का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक नाटक है जो गुप्तकाल की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों की पृष्ठभूमि में रचा गया है। इस नाटक की नायिका ध्रुवस्वामिनी गुप्त सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय की पुत्री है, जिसका विवाह राजनीतिक कारणों से कमजोर शासक रामगुप्त से हुआ है। कथानक में जब शक्तिशाली शक राजा शकराज रामगुप्त को पराजित कर देता है और संधि की शर्त के रूप में ध्रुवस्वामिनी को मांगता है, तो कायर रामगुप्त अपनी पत्नी को सौंपने को तैयार हो जाता है। इस स्थिति में ध्रुवस्वामिनी का साहसी देवर समुद्रगुप्त उसकी रक्षा के लिए आगे आता है और अंततः शकराज का वध कर देता है।

नाटक की मूल संवेदना नारी के स्वाभिमान और व्यक्तित्व की स्वतंत्रता के इर्द-गिर्द घूमती है। ध्रुवस्वामिनी एक आदर्श नारी चरित्र के रूप में चित्रित है जो अपने सम्मान की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है। प्रसाद जी ने इस नाटक के माध्यम से राजनीतिक कायरता, धर्म और राजधर्म के द्वंद्व, तथा प्रेम और कर्तव्य के संघर्ष जैसे गहरे विषयों को उठाया है। नाटक में ध्रुवस्वामिनी का चरित्र न केवल एक व्यक्ति बल्कि राष्ट्रीय गौरव और आत्म-सम्मान का प्रतीक बनकर उभरता है।

यह कृति हिंदी नाटक साहित्य में एक मील का पत्थर मानी जाती है क्योंकि इसमें प्रसाद जी ने अपनी परिपक्व काव्य-दृष्टि और नाटकीय तकनीक का सफल प्रयोग किया है। छायावादी भाषा की मधुरता और ऐतिहासिक तथ्यों का कलात्मक प्रयोग इस नाटक की विशेषता है। आज भी यह नाटक अपनी प्रासंगिकता बनाए रखता है क्योंकि यह नारी सशक्तीकरण, व्यक्तित्व की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय चेतना जैसे विषयों को संबोधित करता है। प्रसाद जी की यह कृति न केवल साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है

नाटकऐतिहासिक नाटकगुप्तकालचौथी शताब्दीछायावादहिंदी साहित्यराजनीतिक षड्यंत्रप्रेमस्त्री स्वतंत्रतावीरतात्यागआदर्शवादमानवीय संघर्षसामाजिक सुधारचंद्रगुप्त द्वितीयरामगुप्तशकों से युद्धभारतीय इतिहासआधुनिक हिंदी नाटक
PublisherKafka
LanguageHindi
CopyrightThe source text and calculation are believed to be in the public domain.

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