शब्द

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कबीर

1h 8m
13,449 words
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मध्ययुगीन भारत में, जब धार्मिक कर्मकांड और जाति-व्यवस्था समाज को जकड़े हुए थी, एक जुलाहा अपनी वाणी से सत्य की खोज करता है। कबीर के दोहे और साखियाँ उस आत्मा की पुकार हैं जो बाहरी आडंबरों को छोड़कर भीतर के परमात्मा को पाना चाहती है। ये शब्द किसी एक धर्म या संप्रदाय के नहीं, बल्कि उस मानवीय अनुभव के हैं जो पाखंड और दिखावे को चुनौती देता है।

कबीर की भाषा में एक अद्भुत सहजता और तीक्ष्णता है। वे रूपकों और प्रतीकों का इस्तेमाल करते हैं—चरखा, तालाब, दीया, बुनाई—जो आम जीवन से उठाए गए हैं, लेकिन जिनमें गहरे दार्शनिक अर्थ छिपे होते हैं। उनकी रचनाओं में व्यंग्य की धार है जो मुल्ला और पंडित, दोनों को एक साथ आईना दिखाती है। भक्ति और ज्ञान का यह मिश्रण, जो न तो पूरी तरह सूफी है न वैदांतिक, एक अलग ही काव्य-संसार रचता है। उनके शब्दों में विद्रोह भी है और प्रेम भी, क्रोध भी है और करुणा भी।

यह संकलन उन पाठकों के लिए है जो काव्य में केवल मधुरता नहीं, बल्कि सत्य की चुभन भी खोजते हैं। जो लोग आध्यात्मिकता को संस्थागत धर्म से अलग समझना चाहते हैं, जो जीवन के सरल प्रश्नों में गहरी दार्शनिकता देख सकते हैं, उनके लिए कबीर की वाणी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। यह वह साहित्य है जो सदियों बाद भी अपनी ताजगी नहीं खोता, क्योंकि इसके केंद्र में शाश्वत मानवीय जिज्ञासाएँ हैं।

PublisherKafka
LanguageHindi