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प्रतिज्ञा

प्रतिज्ञा

मुंशी प्रेमचंद

2h 18m
27,501 words
hi
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गांव की धूल भरी गलियों से लेकर शहर के कोर्ट-कचहरी तक, यह कहानी उस समय के भारतीय समाज की उस परत को उघाड़ती है जहां न्याय और अन्याय के बीच की रेखा अक्सर धुंधली हो जाती है। एक साधारण ग्रामीण परिवार के जीवन में एक ऐसी घटना घटती है जो उन्हें कानूनी व्यवस्था के जटिल जाल में फंसा देती है। प्रेमचंद हमें उन पात्रों से मिलाते हैं जो अपनी मर्यादा और सत्य के लिए संघर्ष करते हैं, जबकि समाज की रूढ़िवादी व्यवस्था उन्हें हर कदम पर चुनौती देती है।

इस कृति में प्रेमचंद का यथार्थवाद अपने चरम पर दिखाई देता है। वे ग्रामीण जीवन की कठोर सच्चाइयों को बिना किसी अलंकरण के प्रस्तुत करते हैं—गरीबी की विवशता, जाति व्यवस्था की जकड़न, और कानूनी प्रक्रिया में साधारण व्यक्ति की असहायता। लेखक की भाषा सरल लेकिन मार्मिक है, जो पाठक को पात्रों की पीड़ा और आशाओं से सीधे जोड़ देती है। कहानी का संवेदनशील स्वर और मानवीय रिश्तों की बारीक समझ इसे केवल एक सामाजिक टिप्पणी से अधिक बनाती है।

यह रचना उन पाठकों के लिए है जो साहित्य में मनोरंजन से आगे सामाजिक सरोकारों की तलाश करते हैं। प्रेमचंद की यह कहानी आज भी प्रासंगिक है क्योंकि यह उन सवालों को उठाती है जो हमारे समाज में अब भी अनुत्तरित हैं—न्याय की पहुंच, गरीब और अमीर के बीच की खाई, और मानवीय गरिमा की रक्षा। यह उन्हें पुरस्कृत करती है जो धैर्य से, गहराई से सोचने को तैयार हैं।

उपन्याससामाजिक यथार्थवादग्रामीण जीवनकिसान संघर्षजमींदारी प्रथाआर्थिक शोषणप्रेमचंद युगभारतीय स्वतंत्रता आंदोलनवर्ग संघर्षनैतिक मूल्यसामाजिक सुधारऔपनिवेशिक भारतआदर्शोन्मुख यथार्थवादमध्यवर्गीय जीवन
PublisherKafka
LanguageHindi
Source
EPUB — Public Domain

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