
सातवीं सदी का इराक। कर्बला के मैदान में इमाम हुसैन का शिविर घिरा हुआ है। एक तरफ खलीफा यज़ीद की सेना है, जो सत्ता के लिए समर्पण की मांग कर रही है; दूसरी ओर हुसैन और उनके मुट्ठी भर साथी हैं, जिन्होंने किसी भी कीमत पर झुकने से इंकार कर दिया है। पानी के रास्ते बंद हैं और सैन्य टकराव निश्चित है।
पाँच अंकों का यह नाटक राजनीतिक दरबारों की कूटनीति से शुरू होकर रेगिस्तान की रणभूमि तक पहुंचता है। इसके दृश्य सत्ता के बल और व्यक्तिगत सत्य के बीच के संघर्ष को मंच पर रखते हैं, जहां अंततः हर पात्र को आत्मसमर्पण या शहादत में से एक को चुनना है।
प्रेमचंद ने ग्रामीण भारत के अपने परिचित परिवेश से परे जाकर इस ऐतिहासिक घटना को आधार बनाया। बीसवीं सदी के तीसरे दशक में बढ़ते धार्मिक तनाव के बीच लिखा गया यह पाठ इस्लामी इतिहास के एक अहम हिस्से को व्यापक हिंदी पाठकों तक पहुंचाने और सांप्रदायिक सद्भाव स्थापित करने का एक वैचारिक कदम था।