
शतरंज के खिलाड़ी
शतरंज के खिलाड़ी मुंशी प्रेमचंद की एक प्रसिद्ध कहानी है जो 1856 के अवध विलय की पृष्ठभूमि में रची गई है। कहानी में दो नवाब मिर्जा सज्जाद अली और मीर रोशन अली को केंद्र में रखा गया है जो शतरंज खेलने के इतने दीवाने हैं कि उन्हें अपने परिवार, व्यवसाय और यहां तक कि देश की राजनीतिक परिस्थितियों की भी कोई चिंता नहीं है। जब अंग्रेज रेजिडेंट जनरल आउट्रम नवाब वाजिद अली शाह से अवध छीनने की योजना बना रहे होते हैं, तब भी ये दोनों खिलाड़ी अपने शतरंज के खेल में मग्न रहते हैं। कहानी का चरम तब आता है जब अवध का विलय हो जाता है और नवाब को निर्वासित कर दिया जाता है, लेकिन ये दोनों मित्र अपने खेल से विमुख नहीं होते।
यह कहानी प्रेमचंद के सामाजिक यथार्थवाद का उत्कृष्ट उदाहरण है जो उस समय की सामंती वर्ग की निष्क्रियता, आलस्य और राजनीतिक उदासीनता पर करारा व्यंग्य करती है। प्रेमचंद ने यह दिखाया है कि कैसे भारतीय शासक वर्ग अपनी विलासिता और निरर्थक शौकों में इतना डूबा था कि उसने देश की स्वतंत्रता खो दी। यह रचना भारतीय साहित्य में ऐतिहासिक महत्व रखती है क्योंकि यह न केवल एक मनोरंजक कथा है, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विस्तार और भारतीय समाज की कमजोरियों का गहन विश्लेषण भी प्रस्तुत करती है। सत्यजीत रे ने इस कहानी पर आधारित एक प्रसिद्ध फिल्म भी बनाई थी जिसने इसे अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई।
































