
हार की जीत मुंशी प्रेमचंद की एक प्रसिद्ध नैतिक कहानी है जो अहिंसा और क्षमा की शक्ति को दर्शाती है। कहानी में बाबा भारतीदास एक सम्मानित और त्यागी साधु हैं जिनकी प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैली है। खेदन सिंह एक कुख्यात डाकू है जो बाबा की प्रसिद्धि सुनकर उन्हें लूटने और उनकी असलियत जानने आता है। जब डाकू बाबा के सामने आता है और उन्हें धमकाता है, तो बाबा बिना किसी भय के अपना सब कुछ उसे सौंप देते हैं। बाबा की निर्भीकता, शांति और करुणा का डाकू के हृदय पर इतना गहरा प्रभाव पड़ता है कि वह अपने अपराधों पर पश्चाताप करता है और बाबा के चरणों में गिर पड़ता है।
यह कहानी प्रेमचंद की आदर्शवादी दृष्टि का सुंदर उदाहरण है जहाँ वे दिखाते हैं कि प्रेम और करुणा सबसे कठोर हृदय को भी बदल सकते हैं। शीर्षक 'हार की जीत' इस विरोधाभास को व्यक्त करता है — बाबा भारतीदास शारीरिक रूप से हारकर भी नैतिक और आध्यात्मिक रूप से विजयी होते हैं। यह रचना गांधीवादी अहिंसा और क्षमा के मूल्यों को प्रतिबिंबित करती है और आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।