सत्य के प्रयोग (आत्मकथा)

सत्य के प्रयोग (आत्मकथा)

महात्मा गांधी

Translated by काशिनाथ त्रिवेदी

15h 20m
183,981 words
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किसी व्यक्ति के जीवन में सत्य क्या है? क्या वह एक निश्चित गंतव्य है या निरंतर खोज की यात्रा? यह आत्मकथा हमें एक साधारण गुजराती परिवार में जन्मे बालक के साथ चलने का निमंत्रण देती है—एक ऐसा बालक जो अपनी कमजोरियों, भयों और गलतियों को छिपाता नहीं, बल्कि उन्हें अपनी आध्यात्मिक और नैतिक यात्रा का अभिन्न अंग मानता है। पोरबंदर की गलियों से लेकर लंदन के कानून के अध्ययन तक, दक्षिण अफ्रीका में नस्लीय भेदभाव के अनुभव से लेकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भागीदारी तक, यह कथा एक मनुष्य के निरंतर आत्म-परीक्षण का दस्तावेज़ है।

यह पुस्तक पारंपरिक आत्मकथाओं से भिन्न है क्योंकि यहाँ लेखक अपनी सफलताओं का गुणगान नहीं करता, बल्कि अपनी असफलताओं और आंतरिक संघर्षों को उजागर करता है। चोरी का एक प्रसंग हो या मांस खाने का प्रयोग, वेश्यालय में पहुँचकर भागना हो या पिता की मृत्यु के समय उपस्थित न होने का अपराधबोध—हर प्रसंग में एक असाधारण ईमानदारी झलकती है। ब्रह्मचर्य, अहिंसा, और अपरिग्रह जैसे प्रयोग केवल राजनीतिक उपकरण नहीं, बल्कि व्यक्तिगत जीवन में सत्य को जीने के माध्यम बनते हैं। भाषा सरल है, लेकिन विचारों की गहराई असीम।

यह कृति उन पाठकों के लिए है जो केवल एक महान नेता की जीवनी नहीं, बल्कि एक साधारण मनुष्य के असाधारण बनने की प्रक्रिया को समझना चाहते हैं। जो पाठक आत्मनिरीक्षण और नैतिक प्रश्नों से जूझने को तैयार हैं, जो यह जानना चाहते हैं कि कैसे छोटे-छोटे दैनिक निर्णय एक व्यक्तित्व को गढ़ते हैं, उनके ल्िए यह पुस्तक एक दर्पण है जो उन्हें स्वयं के भीतर झाँकने को प्रेरित करती है।

Publisherनवजीवन प्रकाशन मंदिर, अहमदाबाद
LanguageHindi
Source
Hindi Wikisource