
सत्य के साथ मेरे प्रयोग
पोरबंदर के एक परिवार में जन्मे और लंदन में वकालत की पढ़ाई करने वाले मोहनदास करमचंद गांधी ने अपने जीवन को सिद्धांतों की एक प्रयोगशाला में बदल दिया। यह पुस्तक उनके शुरुआती जीवन से लेकर 1920 के दशक तक के घटनाक्रमों को दर्ज करती है, जब वे भारत के स्वतंत्रता संग्राम के मुख्य रणनीतिकार बन चुके थे।
इन पन्नों में गांधी अपनी किसी भी विफलता को नहीं छिपाते। वे मांस खाने के बचपन के अपराधबोध, पिता के सामने चोरी की लिखित स्वीकारोक्ति, दक्षिण अफ्रीका में नस्लीय भेदभाव के बीच अधिकारों की लड़ाई और आश्रम जीवन के कठोर नियमों का तथ्यात्मक विवरण देते हैं। उन्होंने सार्वजनिक जीवन के हर कदम और जन आंदोलनों के हर फैसले को सत्य और अहिंसा के व्यक्तिगत प्रयोगों की कसौटी पर परखा।
मूल रूप से गुजराती भाषा में लिखी गई और नवजीवन पत्रिका में साप्ताहिक किस्तों में प्रकाशित यह आत्मकथा बीसवीं सदी के राजनीतिक इतिहास का एक प्रमुख दस्तावेज है। यह ब्रिटिश राज के खिलाफ एक पूरे राष्ट्र को खड़ा करने वाले नेता के वैचारिक और नैतिक विकास का सीधा वृत्तांत है।





















