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शरतचंद्र चट्टोपाध्याय

1h 53m
22,448 words
hi

बंगाल के एक संपन्न परिवार में पली-बढ़ी लड़की ललिता और उसके पड़ोसी शेखर के बीच बचपन से एक अनकही, गहरी आत्मीयता है। दोनों परिवारों के बीच घनिष्ठ संबंध हैं, लेकिन सामाजिक स्थिति में सूक्ष्म अंतर भी। जब ललिता का विवाह शेखर से तय होता है, तो यह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि दो परिवारों की अपेक्षाओं, अहंकार और सामाजिक मान्यताओं का संगम बन जाता है।

शरतचंद्र की यह रचना उन्नीसवीं सदी के बंगाली समाज की जटिल पारिवारिक संरचना को बेहद संवेदनशीलता से उकेरती है। यहाँ प्रेम मात्र भावना नहीं, बल्कि गौरव, आत्मसम्मान और पारिवारिक प्रतिष्ठा की कसौटी पर कसा जाता है। ललिता का चरित्र विशेष रूप से मार्मिक है—एक ऐसी स्त्री जो अपने प्रेम में दृढ़ है, पर साथ ही अपने स्वाभिमान से भी समझौता नहीं करती। उपन्यास की भाषा सरल होते हुए भी गहरी भावनात्मक परतें खोलती है, और घरेलू जीवन के सूक्ष्म तनावों को बड़ी कुशलता से प्रस्तुत करती है।

यह उपन्यास आज भी इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि यह दिखाता है कि कैसे व्यक्तिगत भावनाएँ सामाजिक अपेक्षाओं के जाल में उलझ जाती हैं। जो पाठक मानवीय संबंधों की बारीकियों, मौन पीड़ाओं और अहंकार के सूक्ष्म खेल में रुचि रखते हैं, उनके लिए यह कृति एक भावनात्मक यात्रा है जो लंबे समय तक मन में गूँजती रहती है।

PublisherKafka
LanguageHindi