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अपरिचिता

अपरिचिता

रवीन्द्रनाथ ठाकुर

27 min
5,399 words
hi
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एक युवक के जीवन में प्रेम और विवाह के बीच का अंतर तब स्पष्ट होता है जब वह अपनी मंगेतर से पहली बार मिलने जाता है। परिवार द्वारा तय किए गए इस रिश्ते में वह अपनी शर्तें रखता है, अपनी अपेक्षाएं थोपता है, और एक ऐसा व्यवहार करता है जो उसके अहंकार और सामाजिक स्थिति के अभिमान से भरा है। लेकिन जीवन उसे एक ऐसा सबक सिखाने वाला है जो उसकी समझ को जड़ से हिला देगा।

रवींद्रनाथ ठाकुर की यह कहानी बंगाली समाज में स्त्री की स्थिति, आत्मसम्मान की कीमत, और मनुष्य के भीतर छिपे पूर्वाग्रहों को बेहद सूक्ष्मता से उजागर करती है। कथा का स्वर शांत है, लेकिन भीतर एक तीव्र आलोचना धड़कती रहती है—उस मानसिकता की जो स्त्री को एक वस्तु मानती है, जो दहेज को सम्मान से जोड़ती है, और जो प्रेम को एक सौदे में बदल देती है। नायक की आत्मकथात्मक शैली में सुनाई गई यह कहानी पाठक को उसकी मानसिक यात्रा में साथ ले जाती है, जहां पश्चाताप और आत्मबोध के बीच की दूरी लगातार कम होती जाती है।

यह रचना आज भी प्रासंगिक है क्योंकि यह उन सवालों को छूती है जो समय के साथ धुंधले नहीं हुए हैं—व्यक्तिगत गरिमा, लैंगिक समानता, और मनुष्य की नैतिक चेतना। जो पाठक मानवीय रिश्तों की जटिलताओं में रुचि रखते हैं और जो साहित्य में मनोवैज्ञानिक गहराई की तलाश करते हैं, उनके लिए यह कहानी एक दर्पण है जो असहज करने वाले सत्य दिखाता है।

कथा संग्रहबंगाली साहित्यभारतीय साहित्यउन्नीसवीं सदीबंगाल पुनर्जागरणमानवीय संवेदनास्त्री विमर्शदार्शनिक कहानियाँरोमांटिक साहित्यसामाजिक सुधारनोबेल पुरस्कार विजेताक्लासिक साहित्यहिंदी अनुवादTagoreटैगोर
PublisherKafka
LanguageHindi
Source
tagore-hindi-stories

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