
'विचार: जयशंकर प्रसाद' हिंदी साहित्य के युग-प्रवर्तक रचनाकार जयशंकर प्रसाद के गंभीर चिंतन और आलोचनात्मक दृष्टि का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है। इस संग्रह में 'काव्य और कला', 'रहस्यवाद', तथा 'यथार्थवाद और छायावाद' जैसे निबंध जहाँ उनकी काव्य-मीमांसा और दार्शनिक गहराई को रेखांकित करते हैं, वहीं 'रस', 'नाटकों में रस का प्रयोग' और 'रंगमंच' जैसे लेख भारतीय नाट्य-परंपरा और अभिनय-शिल्प पर उनकी विशद समझ को उजागर करते हैं। 'नाटकों का आरम्भ' और 'आरम्भिक पाठ्य काव्य' के माध्यम से साहित्य के ऐतिहासिक विकास क्रम को परखते हुए, प्रसाद जी ने इस कृति में परंपरा और आधुनिकता का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत किया है, जो साहित्य-प्रेमियों और शोधार्थियों के लिए कला के मर्म को समझने हेतु एक अनिवार्य कुंजी है।