
निरुपमा
2h 56m
35,031 words
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यह निराला का चौथा उपन्यास है। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला हिंदी साहित्य के महानतम आधुनिक लेखकों में से एक थे और हिंदी साहित्य में छायावाद के प्रवर्तक माने जाते हैं। वे एक क्रांतिकारी लेखक थे, जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से स्वतंत्रता-पूर्व के रूढ़िवादी भारतीय समाज की कड़ी आलोचना की।
इस उपन्यास में उनके उदारवादी विचार स्पष्ट रूप से उभर कर आते हैं। निरुपमा, केंद्रीय पात्र, पारंपरिक परिवार में पली-बढ़ी है। वहीं कृष्णकुमार, जो विदेश में शिक्षित है, अपनी डिग्री के बावजूद नौकरी नहीं पा सका और जूते पॉलिश करने लगता है। जब निरुपमा कृष्णकुमार से प्रेम करने लगती है, तो उसका विद्रोही चरित्र सामने आता है, जो स्वयं निराला के विद्रोही स्वभाव का प्रतिबिंब है। यह उपन्यास नाटकीय अंत के साथ समाप्त होता है।
हिंदी साहित्यछायावाद20वीं सदीआधुनिक कालप्रेम काव्यप्रगतिशील साहित्यमानवीय संवेदनासामाजिक चेतनाव्यक्तिवादभारतीय पुनर्जागरणस्त्री सशक्तिकरणनारीवादउपन्यासनिराला
PublisherKafka
LanguageHindi
CopyrightThe source text and calculation are believed to be in the public domain.


























