सफलता

सफलता

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3,080 words
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गाँव के किनारे स्थित एक धवल शिवालय में, युवा विधवा आभा हर शाम देवता के सामने दीप जलाने आती है। विवाह के महज़ एक साल बाद पति की मृत्यु ने उसके जीवन के रंग छीन लिए हैं। अब वह उन शुभ्र शेफ़ाली फूलों की तरह है जो केवल देव-चरणों में अर्पित होने के लिए ज़मीन पर गिरते हैं, किसी के जीवन को महकाने के लिए नहीं। वहीं से गुज़रते हुए यशस्वी लेखक नरेंद्र की नज़र आभा की सकरुण आँखों पर पड़ती है। एक स्त्री के भीतर बुझ चुके दीप और उसे इस हाल में पहुँचाने वाली सामाजिक कुप्रथा को देखकर नरेंद्र के मन में एक नई आग सुलग उठती है।

बाहरी दुनिया की नज़रों में नरेंद्र एक सफल व्यक्ति है, लेकिन आभा का मूक दुख उसकी इस सफलता पर सवाल खड़े करता है। परीक्षाओं और अकादमिक यश की दौड़ के बीच, यह कहानी एक रूढ़िवादी समाज के यथार्थ और दो अलग-अलग ध्रुवों पर खड़े मनुष्यों के मौन टकराव का विवरण है।

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की यह रचना बीसवीं सदी के हिंदी साहित्य के उस दौर से है, जब प्रगतिवाद ने आकार लिया और साहित्य की धारा छायावादी रोमान से मुड़कर सीधे सामाजिक सच्चाइयों की ओर जा रही थी।

PublisherKafka
LanguageHindi
Source
cturii-cmaar-suurykaant-tripaatthii-niraalaa