दो वृद्ध पुरुष

दो वृद्ध पुरुष

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एक गांव के दो वृद्ध किसान, अर्जुन और मोहन, ने वर्षों पहले बद्रीनारायण की तीर्थयात्रा का संकल्प लिया था। अर्जुन धनी है। उसके पास हमेशा कोई न कोई सांसारिक जिम्मेदारी रहती है—पोते का ब्याह, बेटे का गौना, और अब एक नया मकान जिसका खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है। वह अपनी यात्रा को अगले वर्ष तक टालना चाहता है। इसके विपरीत, मोहन एक साधारण बढ़ई है। उसका मानना है कि गृहस्थी के काम कभी पूरे नहीं होते और जीवन रहते उन्हें अपना संकल्प तुरंत पूरा कर लेना चाहिए।

जब वे अंततः अपनी यात्रा पर निकलते हैं, तो उनके सामने धर्म की वास्तविक परीक्षा होती है। यह यात्रा केवल मीलों की दूरी तय करने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इस बात का निर्णय करती है कि क्या असली पुण्य गंतव्य पर स्थित मंदिर पहुँचने में है, या रास्ते में मिलने वाले असहाय लोगों की सेवा करने में।

19वीं सदी में लिखी गई लियो टॉल्स्टॉय की यह कथा किसान जीवन, नैतिकता और आध्यात्म का एक सीधा दस्तावेज़ है। यह संस्करण मूल रूसी आख्यान को भारतीय नामों और बद्रीनारायण की यात्रा के स्थानीय संदर्भों के साथ प्रस्तुत करता है।

PublisherKafka
LanguageHindi
Source
tolstoy-kii-khaaniyaan-leo-tolstoy