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सद्गति

सद्गति

प्रेमचंद

14 min
2,709 words
hi
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एक दलित चमार दुखी अपनी बेटी की शादी के लिए शुभ मुहूर्त जानने की साधारण-सी इच्छा लेकर गाँव के पंडित घासीराम के घर जाता है। यह छोटी-सी ज़रूरत उसे एक ऐसी व्यवस्था के सामने खड़ा कर देती है जहाँ उसकी मानवीय गरिमा, उसकी मेहनत, और उसकी आकांक्षाएँ - सब उसकी जाति के कारण अर्थहीन हो जाती हैं। प्रेमचंद इस कहानी में ब्राह्मणवादी सामाजिक ढाँचे की उस निर्ममता को उजागर करते हैं जो मनुष्य को मनुष्य नहीं मानती।

कहानी की भाषा सीधी और तीखी है, बिना किसी भावुकता के। प्रेमचंद यहाँ अपनी सामान्य करुणा से आगे बढ़कर एक क्रूर यथार्थ दिखाते हैं - वह यथार्थ जहाँ धर्म और परंपरा के नाम पर शोषण को वैधता मिलती है। पंडित घासीराम का चरित्र उस सामंती मानसिकता का प्रतीक है जो दूसरे की पीड़ा को अपना अधिकार समझती है। दुखी की बेबसी, उसकी चुप्पी, और उसके प्रतिरोध न कर पाने की विवशता पाठक को भीतर तक हिला देती है। यह कोई सुधारवादी कहानी नहीं है जो आशा की किरण दिखाए - यह एक दस्तावेज़ है उस अमानवीयता का जो सदियों से भारतीय समाज में व्याप्त रही है।

यह कहानी इसलिए प्रासंगिक बनी रहती है क्योंकि यह जातिगत उत्पीड़न को उसकी नग्न हिंसा में प्रस्तुत करती है, बिना किसी रोमानी आवरण के। जो पाठक सामाजिक यथार्थवाद की उस परंपरा को समझना चाहते हैं जो असहज करने से नहीं हिचकती, और जो साहित्य को समाज का दर्पण मानते हैं, उनके लिए यह अनिवार्य पाठ है।

हिंदी साहित्यजातिवाददलित उत्पीड़नसामाजिक यथार्थवादग्रामीण भारतब्राह्मणवाद की आलोचनाशोषणअस्पृश्यतामानवीय त्रासदीप्रेमचंद युगवर्ण व्यवस्थासामाजिक न्यायऔपनिवेशिक काल
LanguageHindi
Source
Rekhta

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