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विपात्र

विपात्र

गजानन माधव मुक्तिबोध

1h 10m
13,872 words
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"विपात्र" गजानन माधव मुक्तिबोध की एक महत्वपूर्ण कहानी है जो आधुनिक हिंदी साहित्य में मनोवैज्ञानिक यथार्थवाद की उत्कृष्ट कृति मानी जाती है। यह कहानी एक संवेदनशील व्यक्ति की आंतरिक यातना और सामाजिक विसंगतियों के बीच उसके संघर्ष को प्रस्तुत करती है। कहानी का केंद्रीय पात्र अपने आदर्शों और यथार्थ के बीच फंसा हुआ है, जहां वह समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, पाखंड और नैतिक पतन को देखकर आत्मग्लानि और अपराधबोध से ग्रस्त हो जाता है। मुक्तिबोध की विशिष्ट शैली में यह रचना व्यक्ति के भीतरी द्वंद्व और बाहरी सामाजिक दबावों के जटिल अंतर्संबंधों को उजागर करती है।

इस कृति की सबसे बड़ी विशेषता इसका गहन मनोवैज्ञानिक विश्लेषण और फैंटेसी तथा यथार्थ का अद्भुत मिश्रण है। मुक्तिबोध ने इसमें आत्मसंघर्ष, नैतिक दायित्व, बौद्धिक ईमानदारी और सामाजिक प्रतिबद्धता जैसे गंभीर विषयों को उठाया है। कहानी में प्रतीकों और बिंबों का प्रयोग इतना सशक्त है कि पाठक खुद को कहानी के पात्र की मानसिक स्थिति में पाता है। यह रचना नई कहानी आंदोलन के दौरान लिखी गई और इसने हिंदी कथा साहित्य में एक नया आयाम स्थापित किया, जहां मनोविज्ञान और समाजशास्त्र का समन्वय देखने को मिलता है। मुक्तिबोध की यह कृति आज भी प्रासंगिक है क्योंकि यह मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी की विडंबनापूर्ण स्थिति को बखूबी प्रस्तुत करती है।

कहानीगद्य साहित्यहिंदी साहित्यसमकालीन साहित्यप्रगतिशील साहित्यनई कहानीसामाजिक यथार्थवाدमध्यमवर्गीय जीवनमानसिक संघर्षअस्तित्ववादबीसवीं सदीआधुनिक साहित्यमनोवैज्ञानिक कथाबौद्धिक साहित्यप्रयोगवाद
PublisherKafka
LanguageHindi
Source
snklit-khaaniyaan-gjaann-maadhv-muktibodh

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