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कृष्ण और उनकी गीता

कृष्ण और उनकी गीता

भीमराव अंबेडकर

60 min
11,854 words
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भीमराव अंबेडकर का यह दीर्घ निबंध भगवद्गीता की पारम्परिक प्रतिष्ठा को चुनौती देता है। अंबेडकर की स्थापना है कि गीता न तो मूल दर्शन-ग्रंथ है, न ही धर्मग्रंथ — बल्कि यह बौद्ध धर्म के उदय के बाद ब्राह्मणवादी प्रतिक्रांति का दार्शनिक समर्थन है। वे तर्क देते हैं कि गीता तीन बातों को न्यायोचित ठहराती है: युद्ध और हिंसा, चातुर्वर्ण्य व्यवस्था, और कर्मकांड। जैमिनी की पूर्व-मीमांसा, मनुस्मृति और बौद्ध दर्शन का विस्तृत विश्लेषण करते हुए अंबेडकर गीता के रचना-काल को भी बौद्ध धर्म के बाद का सिद्ध करते हैं। यह लेख अंबेडकर के अधूरे पांडुलिपियों से प्रकाशित है।

दर्शनधर्मभगवद्गीताबौद्ध धर्मब्राह्मणवादजाति व्यवस्थाविमर्शहिंदू समाजप्राचीन भारतसामाजिक आलोचनाहिंदी साहित्यपब्लिक डोमेन
LanguageHindi
Source
Hindisamay

Books by भीमराव अंबेडकर

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