
रहीम के दोहे
सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी के मुगल दरबारों और उत्तर भारत के जनजीवन के बीच रचे गए ये दो पंक्तियों के छंद एक ऐसे सेनापति और मंत्री का दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं, जिसने सत्ता के शीर्ष और जीवन की अस्थिरता को प्रत्यक्ष देखा। ब्रजभाषा में रचे गए इन दोहों में राजकाज की नीतियों, मित्रों के स्वभाव और प्रेम की प्रकृति का विवरण है।
इन कविताओं में पानी के महत्व, प्रेम के धागे के टूटने और पेड़ों द्वारा अपना फल स्वयं न खाने जैसे लौकिक दृष्टांतों से दैनिक जीवन के सूत्र गढ़े गए हैं। यहाँ आध्यात्मिक चिंतन और व्यावहारिक कर्तव्यों को एक ही धरातल पर रखकर परखा गया है।
हिंदी साहित्य के मध्यकाल में यह संग्रह भक्ति काल और रीतिकाल के संधि-बिंदु पर उपस्थित है। सूफी मत और भारतीय आध्यात्मिकता के समन्वय से निर्मित यह नीति काव्य तत्कालीन मुगलकालीन समाज के मूल्यों और लोक-व्यवहार का एक प्रामाणिक दस्तावेज़ है।






















