
गरीबी की सबसे गहरी खाई में जीते दो पुरुष—बाप और बेटा—जिनके लिए रोज़ की रोटी भी संघर्ष है। जब परिवार में एक गर्भवती महिला प्रसव पीड़ा से कराहती है, तो घर में न दवा है, न डॉक्टर बुलाने के पैसे, न किसी तरह की मदद का साधन। इस परिस्थिति में घीसू और माधव नामक पिता-पुत्र की जोड़ी अपनी निरीहता और असहायता के बीच फंसी है। लेकिन प्रेमचंद यहां सिर्फ़ गरीबी की कहानी नहीं सुनाते—वे मनुष्य के भीतर की उस जटिल मानसिकता को उघाड़ते हैं जो लगातार अभाव में जीने से पैदा होती है।
यह कहानी अपनी क्रूर ईमानदारी से चौंकाती है। प्रेमचंद यहां न तो गरीबों का महिमामंडन करते हैं, न उन्हें नैतिकता के आदर्श पात्र बनाते हैं। घीसू और माधव की उदासीनता, उनकी जड़ता, उनका आलस्य—सब कुछ निर्ममता से प्रस्तुत किया गया है। लेकिन साथ ही प्रेमचंद यह भी दिखाते हैं कि यह चरित्र किस सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था की उपज है। कहानी का स्वर व्यंग्यात्मक है, पर यह व्यंग्य केवल पात्रों पर नहीं, बल्कि पूरी सामाजिक संरचना पर है जो इंसान को इंसान नहीं रहने देती।
यह उन पाठकों के लिए है जो साहित्य से आसान सांत्वना की उम्मीद नहीं रखते। जो यथार्थ के कड़वे स्वाद को सहन कर सकते हैं और सामाजिक विडंबनाओं को उनकी पूरी जटिलता में समझना चाहते हैं। कफ़न हिंदी साहित्य की उन कालजयी रचनाओं में से है जो हर युग में प्रासंगिक रहती हैं, क्योंकि गरीबी और मानवीय गरिमा का सवाल कभी पुराना नहीं पड़ता।