
बीसवीं सदी के बंगाल के गाँवों और कस्बों में, जहाँ दहेज, जाति व्यवस्था और पारिवारिक मर्यादाएँ रोजमर्रा का जीवन तय करती हैं, ये कथाएँ सीधे उन घरों के भीतर जाती हैं। एक युवती, अनुपमा का प्रेम जो समाज की कठोर दीवारों से टकराता है; चप्पल की एक चोरी का वाकया; काशी का एक प्रेत; सतीत्व और नारीत्व के बीच खींची गई सामाजिक रेखाएँ; और 'लक्कड़ सूंघवा' का खौफ।
इन कहानियों में विधवाओं का जीवन, स्त्रियों का संघर्ष और पारिवारिक संबंध दर्ज हैं। यहाँ ग्रामीण बंगाल का सामाजिक यथार्थ सीधे तौर पर पन्नों पर आता है, जहाँ हर चरित्र अपने हिस्से के सामाजिक बंधनों से घिरा है और अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत है।
यह संग्रह आधुनिक भारतीय साहित्य के शुरुआती दौर का वह हिस्सा है, जिसने पहली बार समाज की कुप्रथाओं और स्त्रियों की स्थिति को कथा साहित्य के केंद्र में रखा। मूल रूप से बांग्ला में रचित इन कहानियों का यह हिंदी अनुवाद है।