
बुद्धू का काँटा
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पाटलीपुत्र (1914) में प्रकाशित यह कहानी गुलेरी के तीन कथा-रत्नों में सबसे चंचल है। रघुनाथ पढ़ा-लिखा है, पर गाँव की बोली और भोलेपन के कारण ‘बुद्धू’ कहलाता है; भागवन्ती शहर की पढ़ी युवती है जो उसका उपहास करती है। नदी-किनारे काँटा चुभने की एक घटना इस नोकझोंक को जिस मोड़ पर ले जाती है, वहाँ हास्य और अनुराग की गुलेरी-छाप जुगलबंदी अपने चरम पर है। संवाद-प्रधान शैली इसे हिन्दी की शुरुआती कहानियों में सबसे आधुनिक बनाती है।
कहानी संग्रहहिंदी साहित्यप्रेम कथाहास्य-व्यंग्यग्रामीण जीवनविवाहस्वतंत्रता-पूर्व साहित्यक्लासिक साहित्यहिन्दी की अमर कहानियाँ
LanguageHindi
Source
उसने कहा था और अन्य कहानियाँ (राजपाल एण्ड सन्ज़, 2014)





















