
बीसवीं सदी की शुरुआत में जब लार्ड कर्जन भारत के वायसराय थे — विश्वविद्यालय अधिनियम, बंगाल विभाजन, और दर्जनों दमनकारी नीतियों के कारण कुख्यात — तब एक हिन्दी पत्रकार ने उनसे सीधा संवाद करने का अनोखा रास्ता चुना। बालमुकुंद गुप्त (1865-1907), 'भारतमित्र' के सम्पादक, ने 'शिवशम्भु शर्मा' नाम के एक काल्पनिक भङ्गी की क़लम से कर्जन को आठ चिट्ठियाँ लिखीं — जिनकी भाषा इतनी तेज़, इतनी कटु, और इतनी रोचक है कि वे आज भी हिन्दी व्यंग्य-साहित्य की अप्रतिम कृति मानी जाती हैं।
इन चिट्ठियों में हास्य की चादर में लिपटी क्रांतिकारी राजनीति है। 'बनाम लार्ड कर्जन' में बुलबुला और बुलबुलबाज़ का रूपक है। 'श्रीमान् का स्वागत' दूसरे कार्यकाल पर वायसराय के लौटने का व्यंग्यपूर्ण अभिनन्दन है। 'पीछे मत फेंकिये' और 'आशा का अन्त!' राष्ट्रवादी आकांक्षाओं और उनके निरादर के बीच की कथा हैं। 'वंग-विच्छेद' — 1905 के बंगाल विभाजन पर लिखी अंतिम चिट्ठी — हिन्दी पत्रकारिता के सबसे साहसी क्षणों में से एक है।
गुप्त की भाषा भारतेन्दु-युग की लज्ज़त और उर्दू-फारसी के मुहावरे को मिलाकर एक ऐसा वर्णक्रम बनाती है जो आज भी ताज़ा लगती है। 'शिवशम्भु' की आड़ से वे ऐसी बातें कह जाते हैं जो किसी संपादकीय में लिखना असंभव था। यह पुस्तक हिन्दी में राजनीतिक व्यंग्य की परंपरा का आधार-स्तंभ है — हरिशंकर परसाई और शरद जोशी से लेकर समकालीन व्यंग्यकारों तक की वंशावली यहीं से शुरू होती है।
यह पुस्तक उन पाठकों के लिए है जो हिन्दी गद्य की उत्कृष्टता को उसके राजनीतिक चरम पर देखना चाहते हैं — और जो जानना चाहते हैं कि औपनिवेशिक सत्ता को चुनौती देने का सबसे शक्तिशाली हथियार कभी हँसी हुआ करता था।