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घर और बाहर

घर और बाहर

रबीन्द्रनाथ ठाकुर

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1905 के बंगाल विभाजन और स्वदेशी आंदोलन की पृष्ठभूमि में, एक कुलीन जमींदार निखिल अपनी पत्नी बिमला को घर की पारंपरिक चारदीवारी से बाहर निकलकर दुनिया देखने के लिए प्रोत्साहित करता है। उनका जीवन तब बदल जाता है जब निखिल का मित्र संदीप उनके घर आकर रुकता है। संदीप एक आक्रामक राष्ट्रवादी नेता है, जो विदेशी माल के बहिष्कार और उसे जलाने का अभियान चला रहा है।

बिमला संदीप के उग्र भाषणों और उसके राजनीतिक जुनून की ओर खिंची चली जाती है। यह त्रिकोणीय संबंध जल्द ही दो अलग-अलग विचारधाराओं की टकराहट में बदल जाता है। एक ओर निखिल का शांत आदर्शवाद है, जो मानता है कि मनुष्य का जीवन किसी भी राजनीतिक विचार से बड़ा है; और दूसरी ओर संदीप की वह जिद है, जो देश के नाम पर हर तरह की कट्टरता और हिंसा को सही ठहराती है।

रबीन्द्रनाथ ठाकुर का यह उपन्यास मूल रूप से 1916 में प्रकाशित हुआ था। यह 20वीं सदी की शुरुआत के स्वतंत्रता संग्राम, उग्र होती राजनीति और राष्ट्रवाद की वेदी पर बिखरते पारिवारिक रिश्तों का एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ है।

उपन्यासबंगाली साहित्यस्वदेशी आंदोलनराष्ट्रवादप्रेम कहानीस्त्री-पुरुष संबंधराजनीतिक उपन्याससामाजिक उपन्यास20वीं सदीबंगाल विभाजनआधुनिक भारतीय साहित्यमनोवैज्ञानिक उपन्यासत्रिकोणीय प्रेमस्वतंत्रता संग्राममहिला सशक्तिकरण
PublisherKafka
LanguageHindi
Source
Adbi duniya

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