
कलकत्ता की सड़कों पर अपनी बेटी की उम्र की एक बच्ची से दोस्ती करने वाला एक अफगान मेवा विक्रेता; उलापुर के एक सुदूर गाँव में अकेलेपन से जूझता एक शहरी पोस्टमास्टर; एक ऐसी स्त्री जो श्मशान में होश में आती है और अपनों को ही यह साबित करने की कोशिश करती है कि वह अभी ज़िंदा है; और एक पत्नी जो ससुराल की दहलीज पार कर अपने पति को अपनी आज़ादी का पत्र लिखती है।
उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के बंगाल की पृष्ठभूमि में रची गई ये कहानियाँ ग्रामीण जीवन और आधुनिकता के बीच के तनाव को दर्ज करती हैं। यहाँ तत्कालीन भारतीय समाज, जाति व्यवस्था की कठोरता और स्त्रियों की स्थिति का सीधा दस्तावेजीकरण है।
नोबेल पुरस्कार विजेता रबीन्द्रनाथ ठाकुर का यह संग्रह आधुनिक भारतीय लघु कथा की नींव माना जाता है, जिसने बंगाल पुनर्जागरण के सामाजिक यथार्थ और मनोवैज्ञानिक बदलावों को सीधे तौर पर साहित्य में जगह दी।