
देवांगना
वज्रतारा के मंदिर में, एक देवदासी का जीवन देवताओं की सेवा और कठोर नियमों के अधीन है। लेकिन जब एक गुप्त योजना और एकांत मिलन के बाद प्रेम जन्म लेता है, तो मंदिर की सत्ता और सामाजिक मर्यादाएं उसे कुचलने के लिए सामने आती हैं। वाराणसी के घाटों से लेकर कापालिकों के अंधेरे ठिकानों तक, वह धर्म और एक राजा के साले की साजिशों के बीच अपने प्रेम को बचाने का प्रयास करती है।
भिक्षुओं के विहार, सुखानंद के आगमन और सिद्धेश्वर के कोप के बीच नये षड्यंत्र रचे जाते हैं। एक ओर अशोक के काल का साम्राज्य और बौद्ध धर्मदूतों का संसार है, तो दूसरी ओर एक स्त्री का व्यक्तिगत युद्ध—जहाँ बंदीगृह, प्रसव, एक कापालिक का चंगुल और नंगी तलवार उसका रास्ता रोकते हैं।
यह उपन्यास बीसवीं सदी के छायावादोत्तर हिंदी साहित्य की उस ऐतिहासिक आख्यान परंपरा का हिस्सा है, जिसमें आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने प्राचीन भारत और देवदासी प्रथा के यथार्थ को कथा का रूप दिया।






















