
वैश्योपकारक (1904) में छपा यह लघु रूपक गुलेरी की व्यंग्य-दृष्टि का निचोड़ है। एक मनुष्य कहीं जाने के लिए पगडण्डी काटता है; पीछे आने वालों के लिए वह स्थान ही पूज्य हो जाता है — हाता खिंचता है, छप्पर पड़ता है, धर्मशालाएँ और घंटाघर बनते हैं, और भीतर जाने की बात किसी को याद नहीं रहती। सम्प्रदाय इस पर लड़ते हैं कि मन्दिर की कौन-सी दीवार छूनी चाहिए, और अन्त में घंटाघर सूर्य से भी पीछे रह जाता है। सौ वर्ष से अधिक पुराना यह व्यंग्य हर उस संस्था पर आज भी उतना ही चुभता है जो साधन को साध्य बना बैठती है।