
मंटो के रेखाचित्र उनके साहित्यिक सफ़र का एक अनूठा पहलू हैं। वैसे तो मंटो अपनी मर्मांतक और तल्ख़ कहानियों के लिए जाने जाते हैं, लेकिन वे बंबई की फ़िल्मी दुनिया के एक मंझे कथाकार भी थे। इस संग्रह में उन लोगों के बेबाक और निजी शब्द-चित्र हैं जिनके साथ उन्होंने काम किया और वक़्त गुज़ारा। इन ख़ाकों में अशोक कुमार, नर्गिस और नूर जहाँ जैसे सितारों की ज़िंदगी को एक दूर खड़े प्रशंसक की नहीं, बल्कि उस दोस्त की नज़र से देखा गया है जिसने उनके साथ स्टूडियो में सिगरेटें और शामें साझा की हों। ये कोई मामूली जीवनियाँ नहीं हैं; मंटो मशहूर कलाकारों और आम इन्सानों में फ़र्क़ नहीं करते। वो अपने दोस्तों और सहयोगियों की ईर्ष्या, दरिया-दिली और सनक को एक पत्रकार की नज़र और एक कहानीकार के अंदाज़ में पेश करते हैं। ये किताब हिंदी सिनेमा के सुनहरे दौर और उर्दू अदब की दुनिया में झाँकने का एक नायाब झरोखा है। साथ ही, इस्मत चुग़ताई और अख़्तर शीरानी जैसे अदीबों के क़िस्से उस दौर की साहित्यिक सरगर्मियों को ज़िंदा कर देते हैं। सबसे दिलचस्प ख़ाका ख़ुद 'मंटो' का है, जहाँ वे अपनी ही विरोधाभासी शख्सियत का निर्ममता से ऑपरेशन करते हैं।