
बेताल पच्चीसी
एक राजा और एक रहस्यमय प्रेत के बीच एक असाधारण समझौता होता है। राजा विक्रम को एक योगी के लिए एक बेताल को पकड़कर लाना है जो एक पुराने पेड़ पर उल्टा लटका रहता है। लेकिन यह कोई साधारण कार्य नहीं है - हर बार जब राजा बेताल को पकड़ता है और यात्रा शुरू करता है, तो बेताल एक कहानी सुनाता है जो एक जटिल नैतिक पहेली में समाप्त होती है। शर्त यह है कि यदि राजा उत्तर जानते हुए भी चुप रहे, तो उसका सिर फट जाएगा, और यदि वह बोले, तो बेताल वापस पेड़ पर पहुँच जाएगा।
पच्चीस कहानियों के इस संग्रह में हर कथा मानवीय स्वभाव, धर्म, न्याय और नैतिकता के गहन प्रश्न उठाती है। कहानियाँ सरल दिखती हैं लेकिन उनमें छिपी दुविधाएँ इतनी पेचीदा हैं कि पाठक को सोचने पर मजबूर कर देती हैं - सच्चा वीर कौन है, सही निर्णय क्या है, और कर्तव्य की सीमाएँ कहाँ खत्म होती हैं। प्रत्येक पहेली इस तरह बुनी गई है कि कोई एक सही उत्तर नहीं है, बल्कि तर्क और विवेक की कसौटी है। लोक कथाओं की सरल भाषा में गूढ़ दार्शनिक सवाल पूछने की यह शैली इस संग्रह को विशिष्ट बनाती है।
सदियों से यह कथा परंपरा भारतीय मौखिक साहित्य का अभिन्न हिस्सा रही है क्योंकि यह मनोरंजन के साथ-साथ बुद्धि को भी चुनौती देती है। यह पुस्तक उन पाठकों के लिए है जो केवल कहानी नहीं, बल्कि हर कहानी के भीतर छिपे नैतिक संघर्ष और मानवीय जटिलताओं को समझना चाहते हैं। यह उन्हें पुरस्कृत करती है जो प्राचीन ज्ञान और आधुनिक प्रश्नों के बीच सेतु खोजते हैं।







