
उर्दू अदब में हास्य और व्यंग्य के बेताज बादशाह शौकत थानवी की कलम का जादू आज भी पाठकों के सिर चढ़कर बोलता है। 'प्रतिनिधि व्यंग्य: शौकत थानवी' केवल हंसी-ठिठोली का पुलिंदा नहीं है, बल्कि यह आम आदमी की ज़िंदगी की उन विसंगतियों का एक चुटीला दस्तावेज़ है, जिसे हम अक्सर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। थानवी साहब की खासियत यह है कि वे बिना किसी कड़वाहट के, बड़ी ही मासूमियत और रवानी के साथ समाज की दुखती रग पर हाथ रख देते हैं। इस संग्रह में शामिल रचनाएँ आपको गुदगुदाएंगी भी और सोचने पर मजबूर भी करेंगी, जिससे यह साबित होता है कि उनका लेखन समय की सीमाओं से परे है और आज भी उतना ही प्रासंगिक है।