
हॉस्टल में पढ़ना पतरस बुख़ारी द्वारा रचित एक प्रसिद्ध हास्य-व्यंग्य निबंध है जो उर्दू-हिंदी साहित्य में हास्य लेखन की एक उत्कृष्ट मिसाल माना जाता है। यह रचना छात्रावास में रहने वाले विद्यार्थियों के जीवन की वास्तविकताओं और संघर्षों को अत्यंत रोचक और हास्यपूर्ण तरीके से प्रस्तुत करती है। बुख़ारी अपने विशिष्ट लेखन शैली में यह दर्शाते हैं कि कैसे एक छात्रावास में पढ़ाई करना एक असंभव कार्य बन जाता है - निरंतर शोर-शराबा, साथी छात्रों की विभिन्न आदतें, और अनगिनत व्यवधान जो एकाग्रता को भंग करते रहते हैं।
इस निबंध में पतरस बुख़ारी ने छात्रावासीय जीवन की विडंबनाओं को बड़ी कुशलता से उजागर किया है। वे बताते हैं कि कैसे एक विद्यार्थी पढ़ने बैठता है और फिर विभिन्न प्रकार के अवरोध उसके सामने आते हैं - कोई मित्र चाय पीने बुलाता है, कोई गपशप करने आ जाता है, कोई अपनी समस्याएं लेकर आता है। लेखक की सूक्ष्म निरीक्षण शक्ति और व्यंग्यात्मक दृष्टि इस साधारण विषय को असाधारण बना देती है। यह रचना केवल हास्य के लिए नहीं बल्कि शैक्षिक संस्थानों और सामूहिक जीवन की वास्तविकताओं पर एक सामाजिक टिप्पणी भी है। पतरस बुख़ारी का यह निबंध आज भी प्रासंगिक है क्योंकि छात्रावासीय जीवन की बुनियादी चुनौतियां समय के साथ बहुत नहीं बदली हैं, और इसकी सहज हास्य शैली इसे हर पीढ़ी के पाठकों के लिए आनंददायक बनाती है।